राजपूत : पराभव और सुनियोजित दुष्प्रेरण की कहानी

सिपहसालार प्रतिहार (translated by P S Shekhawat)

स्वतंत्रता के बाद अंग्रेजों के जाने के साथ ही सभी राजनैतिक पार्टियों चाहे वो कांग्रेस हो या जन संघ, को नवजात लोकतंत्र की कमियों और उसमे व्याप्त भ्रष्टाचार से ध्यान हटाने के लिए नए दुश्मनों की जरूरत थी, कोई ऐसा विरोधी जिस पर अंगुली उठायी जा सके, जिसके खिलाफ अधिकाँश जनता को अपने पक्ष में खड़ा किया जा सके और अपने अपने ढंग से समाज का ध्रुवीकरण किया जा सके |

ये परिस्तिथियाँ कमोबेश सभी नव लोकतंत्रों में विद्यमान रही हैं| सामान्यतः ऐसी परिस्थितियों में विश्व भर में नए लोकतंत्रों में पुरानी राजशाही एवं अभिजात्य वर्ग को निशाना बनाया गया, परन्तु हम उत्तरी भारत की बात करें तो मुगल काल के अंत तक जो राजशाहियाँ थी वो अलग अलग समुदायों से थी -जैसे राजपूत, सिक्ख जट्ट, मराठा,जाट,भूमिहार,ब्राह्मण,पठान, भारतीय ईरानी आदि | जैसे भरतपुर, धौलपुर, पटियाला आदि में जाट राजवंश , दरभंगा, बनारस आदि में भूमिहार राजवंश , अयोध्या , झांसी आदि के ब्राह्मण राजवंश , ग्वालियर में मराठा, इंदौर आदि राजवंश या जूनागढ़, भोपाल, पालनपुर पटौदी आदि में पठान राजवंश ।

तो चूँकि उत्तर भारत के सभी राजतंत्रों को तो निशाना कैसे बनाया जाये क्यूंकि ऐसा करने पर ध्रुवीकरण करने के लिए कुछ बचता ही नहीं, तो इस समस्या के समाधान के लिए दोषारोपण का लक्ष्य राजतंत्रों को नहीं बल्कि एक जातीय समूह को बनाया गया, वो समूह था — राजपूत।

अब सवाल उठता है कि राजपूत ही इस बुर्जुआ कुलीन वर्ग के लिए, चाहे वाम पंथ हो चाहे दक्षिण पंथ, एक नरम लक्ष्य क्यों बने, इसका एक प्रमुख समाजशास्त्रीय कारण निम्नानुसार विश्लेषित किया जा सकता है:

– जहाँ अपने लिए क्षत्रिय स्टेटस प्राप्त करने की महत्वाकांक्षा रखने वाली जाट, अहीर और गुर्जरों जैसी जातियां सामाजिक और राजनीतिक रूप से राजपूतों को मिटाने के लिए सहयोग उपलब्ध करवाने को तत्पर थीं वहीँ राजपूत समुदाय जो पहले से ही भूमि के विभाजन के कारण आर्थिक उलटफेर से जूझ रहा था उसमे पढ़े लिखे राजपूत बुर्जुआ वर्ग की अनुपस्थिति ने भी इसमें बड़ी भूमिका निभाई| जहाँ विरोधियों के पास सत्ता प्राप्ति को उत्सुक सुनियोजित विचारधारा से संचालित एक पढ़ा लिखा वर्ग उपलब्ध था वहीँ राजपूतों के कुलीन वर्ग,बड़े बड़े रजवाड़ों एवं ठिकानेदारों ने, जिनके पास परम्परागत रूप से राजपूत समाज का नेतृत्व रहा, कभी भी एक शिक्षित मध्यम वर्गीय,सामजिक चेतना से परिपूर्ण राजपूत बुर्जुआ वर्ग के अस्तित्व की आवश्यकता महसूस नहीं की | नतीजा ये हुआ की एक के बाद एक दूषित एवं चरम आख्यानों की श्रृंखला शुरू की गयी जिसमे एक पूरे के पूरे जातीय समूह को खलनायक घोषित किया गया |

इसकी परिणति यह हुई है कि आज इस 5–6 करोड़ से भी अधिक जनसँख्या के जातीय समूह के खिलाफ आम अवधारणा कुछ इस प्रकार परोसी गयी है: “वे सभी अत्याचारी थे, अत्यधिक विलासिता का जीवन जीते थे, मुग़लों, मराठों सहित सभी से हार गए, कभी कोई युद्ध नहीं जीता, मुगलों को लड़कियां ब्याहते थे और अंग्रेजों से बिल्कुल भी नहीं लड़े ”।

अब कल्पना कीजिए कि किसी टूटे हुए ग्रामोफ़ोन रिकॉर्ड की भाँती इस प्रकार की अवधारणा किसी भी अन्य समुदाय के खिलाफ बार बार दोहराई जाती तो उस समुदाय एवं उनके हितैषी अन्य समुदायों द्वारा ऐसी अवधारणा को न सिर्फ मिथ्या साबित करने के लिए भयंकर प्रयास किये जाते बल्कि एक पूरे समुदाय के प्रति घृणा फैलाने के लिए ऐसे षड्यंत्रकारियों को कटघरे में खड़ा कर दिया जाता (एक उदहारण के लिए सिक्खों द्वारा अलग खालिस्तान की मांग, भारतीय सेना में सिक्खों के विद्रोह, ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद की परिस्थितयों को लें तो क्या आज पूरे सिक्ख समुदाय को इन सब बातों के लिए कटघरे में खड़ा किया जाता है? नहीं ) लेकिन राजपूत समुदाय के लिए इन तथाकथित लिबरल विचारकों को इस प्रकार की आवश्यकता महसूस नहीं होती |

इसलिए राजपूतों को सामाजिक रूप से आहत करने का चाहे पंजाबी खत्री-जाट, मराठा लॉबी से संचालित बॉलीवुड का अभियान हो या चाहे फिर मराठाओं के स्वामित्व वाले राजपूत समुदाय के खिलाफ प्रचार में लगे हुए मीडिया पोर्टल हो (https://scroll.in/), न केवल ये निर्बाध रूप से जारी हैं बल्कि लुटियन सर्कल और नागपुर-संचालित तथाकथित हिन्दुत्ववादी सर्कल (आरएसएस और समान विचारधारा वाले संगठन पढ़ें), दोनों तरह के तथाकथित उदारवादियों द्वारा निरंतर इनको प्रोत्साहन भी जारी है |

पंजाबी बॉलीवुड — सामाजिक रूप से राजपूतों को छलनी करने के लिए एक उपकरण

मैं इस बहस में नहीं पडूंगा की बॉलीवुड नैतिक भ्रष्टाचार का साधन है या नहीं वो काम आप उदारवादियों पर छोड़ दीजिये | लेकिन बॉलीवुड में जो आइडेंटिटी गेम खेला जा रहा है उसे नजरअंदाज करना मुश्किल है |

अगर कोई ध्यान से विश्लेषण करे तो बॉलीवुड पंजाबी और जाट पहचान को काफी बढ़ावा देता है वहीँ दूसरी ओर वही बॉलीवुड

-राजपूतों पर मिथ्या अलगाववादी छवि को थोपता है(गुलाल (2009)) (राजस्थान में ऐसा कोई आंदोलन हमने नहीं सुना लेकिन ऐसा जहाँ वास्तव में हुआ उस खालिस्तान मूवमेंट पर कोई मूवी नहीं बनेगी)|

-हॉकी के महानायक कुंवर दिग्विजय सिंह (अमित साध, गोल्ड (2019)) को एक बेलगाम घमंडी के रूप में भी चित्रित करता है।

-राजपूत की पहचान एक खलनायक की बनाता है (मनोज पाहवा द्वारा निभाया गया ब्रह्मदत्त सिंह का किरदार आर्टिकल- 15) , हालांकि वास्तविक घटना में राजपूत पृष्ठभूमि का कोई भी अपराधी शामिल नहीं था |

-महारानी गायत्री देवी को ऐसे भोंडे चरित्र चित्रण (इलियाना डीक्रूज द्वारा निभाया गया किरदार) में प्रस्तुत करेगा जो सिर्फ सत्ता की भूखी है और किसी भी पुरुष के साथ सो रही है (बादशाहो (2017) |

– ‘वीर (2010)’ फिल्म में उन पिंडारियों को हीरो बनाया जाता है,जो वास्तव में लुटेरे थे और मराठाओं के लिए फिदायीन टोलियों की तरह काम करते थे, बदले में मराठा उन्हें जनता से लूटमार कर प्राप्त माल रखने की खुली छूट देते थे | मेवाड़, मारवाड़, जयपुर को तहस नहस कर उनको अंग्रेजों की सहायता लेने पर मजबूर कर देने वाले उस समय के ये जो एक दूसरे के सहयोगी समूह हैं उनके दोनों के ही प्रति सहानुभूति रखने वाली लोबी आज के बॉलीवुड में मौजूद है| तो इसमें क्या आश्चर्य कि इस फिल्म में पिंडारी हीरो और राजपूत दब्बू और डरपोक दिखाए जाएँ जिनकी लड़की राजपूत राजकुमारों की बजाय किसी पिंडारी का वरण करती है( ये एंगल तो कहानी में जरूरी है वरना राजपूतों को नीचे दिखने में कमी रह जाती है | )

– हमारे महान राजपूत मिलिट्री कमांडर्स, परमवीर चक्र विजेताओं, पर उनका शौर्य दिखाने वाली फ़िल्में नहीं बनाएगा लेकिन किसी फिल्म (शौर्य 2008 ) में कोई मेजर वीरेंदर सिंह राठौड़ और ब्रिगेडियर रूद्र प्रताप सिंह तानाशाही सेनानायक जरूर दिखाएँ जायेंगे जो मानवाधिकारों का उल्लंघन करते हैं और फिर कोई मेजर सिद्धांत चौधरी आकर इन दो राजपूत मिलिट्री ऑफिसर्स के विरुद्ध न्याय का देवता बन जाता है | राजपूत पहचान का चरित्र हनन करने में कोई कमी न रह जाये इसलिए ब्रिगेडियर रूद्र प्रताप सिंह से राजपुताना राइफल्स का ध्येय वाक्य “ वीर भोग्या वसुंधरा “ जरूर कहलवाया जाएगा

इस तरह , न केवल अत्याचारियों (शौर्य (2008)), हारे हुए (पद्मावत (2017)), मुग़लों से वैवाहिक सम्बन्ध रखने वाले (जोधा-अकबर (2008), अलगाववादी (गुलाल (2009)) जैसी घृणित छवियों को राजपूत समुदाय पर थोपा जाता है, बल्कि केडी सिंह और गायत्री देवी जैसे वास्तविक जीवन के व्यक्तित्वों की छवि धूमिल की जाती है।

अगर ग़लती से किसी राजपूत चरित्र पर नायक रूप में फिल्म बना भी दी जाती है तो इस बात को आप लिखवा लीजिये कि उस पूरी फिल्म में ये पूरा ध्यान रखा जाएगा कि उसकी राजपूत पहचान उजागर नहीं होने दी जाये ( मिल्खा सिंह, पान सिंह तोमर, सगत सिंह राठौड़ (पल्टन)), या फिर पहचान उजागर तभी होगी जब उसके सामने किसी दूसरे राजपूत को खड़ा कर उनकी लड़ाई दिखाई जाएगी, कुछ इस तरह कि अंत में आप खुद ये निर्णय नहीं कर पाएंगे की राजपूत इस फिल्म में हीरो उभर के सामने आया कि विलैन |

इस बारे में एक उल्लेख करेंगे कि हाल ही में हुई जाट संसद में जयपुर जाट हॉस्टल के संचालक विजय पुनिया द्वारा दिया गया बयान ध्यान में रखा जान चाहिए जिसमे वो खुद कह रहा है कि उसने धर्मेंद्र को कह कर 1985 में एक फिल्म बनवायी ‘गुलामी’ | इस फिल्म से राजपूत जागीरदारों को खलनायक दिखाने एवं उनके सामने धर्मेंद्र और जाट रेजिमेंट के मिथुन द्वारा उनके खिलाफ संघर्ष दिखाने का जो सिलसिला चलाया गया वो बदस्तूर जारी है | आप स्वयं विचार करें कि किस प्रकार सुनोयिजत संस्थागत रूप से हमें खलनायक प्रचारित करने की कोशिशें कितने समय से और कहाँ कहाँ चल रही है|

और ये न माने कि केवल यही कुछ उदाहरण है इनके इस दूषित अभियान के , अधिकतर फिल्मों का विश्लेषण आप स्वयं करें | सोचना शुरू करें तस्वीर साफ़ हो जाएगी कि हैफा की लड़ाई पर बॉलीवुड मूवी क्यों नहीं बनाता या पुर्तगालियों से गोवा छुड़ाने वाले, चीन को 1967 में नाथू ला में धुल चटाने वाले और 1971 की लड़ाई में बांग्लादेश के ढाका पर कब्ज़ा कर पकिस्तान को सरेंडर करवाने वाले Lt Gen. सगत सिंह हों (जी हाँ Lt Gen. J. J. Arora सिर्फ साइन करवाने पहुंचे थे। उस फोटो में जो पाक जनरल नियाजी के ठीक पीछे खड़े है रियल हीरो सगत सिंह राठौड़), या इंडियन पैरा स्पेशल फोर्सेज की पहली सर्जिकल स्ट्राइक टीम बनाने वाले मेघ सिंह राठौड़ हों पर कोई मूवी क्यों नहीं बनती| आजादी से पहले के राजपूत हीरोज को तो आप भूल ही जाइये ये तो आजादी के बाद के उदाहरण हैं |

एक प्रश्न यह उठता है कि आखिरी बार सिखों, खत्रियों, मराठों या जाटों के लिए इस तरह का सिनेमाई चित्रण कब किया गया था? कहीं नहीं मिलेगा बल्कि इसके उलट इनका नायकों के रूप में चित्रण तो बॉलीवुड में सबसे अधिक प्रचारित और चहेता है, कारण स्पष्ट हैं |

यह भी ध्यान दें कि ज़मींदारियाँ और ठकुराई सिर्फ राजपूतों के पास ही नहीं थे , और अधिकांश राजपूत ज़मींदार भी नहीं थे, फिर भी राजपूत उस क्रूर ठाकुर का प्रतीक बन जाते हैं जो गरीबों का शोषण करता है — फिल्मों में यह जमींदार कभी भी जाट चौधरी , भूमिहार चौधरी, या खत्री महाजन नहीं मिलेगा आपको|

और यह सिर्फ पुराने ज़माने के राजपूत ठाकुरों के चित्रण का सवाल नहीं है , बल्कि राजपूतों को ‘’ गर्व और बुराई ‘’ के रूप में बताने का यह खेल, हमारे समाज के हर तबके, चाहे आज के सशस्त्र सेनाओं के जवान हों , खिलाड़ी हों (वास्तविक खेल जगत की हस्तियों का भी, जैसा हमने ऊपर वर्णन किया है ) और यहां तक ​​कि छात्रों के लिए भी (गुलाल (2009) बदस्तूर जारी है।

इन कारगुजारियों के दो उद्देश्य हैं जो स्पष्ट रूप से सामने आते हैं:

-सबसे पहले, राजपूत समुदाय को सिविल सोसाइटी और समाज की मुख्यधारा में प्रतिनिधित्व से अलग रखना ।

-दूसरा उद्देश्य है , इसे सार्वजनिक उपहास के विषय के रूप में रखना और दूसरे प्रमुख समुदायों के हितों की रक्षा और उनक एकछत्र प्रभुत्व बनाये रखने के लिए इसे पंचिंग बैग के रूप में बनाए रखना है।

लेफ्ट और राइट : राजपूतों की आवाज़ दबाता मीडिया

कुछ इसी तरह के दूषित उद्देश्य मराठा स्वामित्व वाली वेबसाइट scroll.in के हैं , जहाँ गिरीश शहाणे और रुचिका शर्मा द्वारा केवल एक नहीं बल्कि एक के बाद एक कई संदर्भ रहित एवं तथ्य रहित लेख प्रकाशित किए , जबकि इसके संपादकीय प्रमुख नरेश फर्नांडीस द्वारा राजपूत समुदाय के सदस्यों द्वारा इन दुर्भावना पूर्वक लेखों के किये गए किसी भी खंडन या यहां तक ​​कि काउंटर-व्यू को छापने तक से इनकार कर दिया गया | इन लोगों के द्वारा ऐसा कोई विश्लेषण खुद के लोगों (मराठाओं ) के लिए छपा हुआ आप कभी नहीं पाएंगे |

किसी और समुदाय के लिए ऐसे शब्दों की मीडिया में आप कल्पना कीजिये

और कमोबेश यही रवैय्या पूरे मीडिया-स्पेक्ट्रम में बनाए रखा गया है। इसके उलट इसी तरह का कोई मुद्दा अगर उन समुदायों के लिए सामने आता है, जिनकी हमने ऊपर बात की है — जाटों, सिखों, खत्रियों, पठानों आदि के संबंध में तो आप पाएंगे कि इन समुदायों के बुद्धिजीवियों को एक अपना दृष्टिकोण रखने के लिए हमेशा जगह दी जाती है।

उदाहरण के लिए खालिस्तान आंदोलन की ऊंचाई के दिनों में भी आप पाएंगे कि सिक्ख बुद्धिजीवियों को इस बात का बार-बार अवसर मीडिया ने दिया जहाँ वो सिक्ख कट्टरपंथियों की निंदा कर सकें तो वहीँ पूरे सिक्ख समुदाय के प्रति घृणा का भी विरोध कर सकें । मुस्लिम बुद्धिजीवियों के सन्दर्भ में भी आपको ऐसे उदाहरण मिल जायेंगे । एक और अच्छा उदाहरण है कि मराठा क्रांति मोर्चा द्वारा किये गए आंदोलन को Quint.in और अन्य पोर्टल द्वारा किस तरह से कवर किया गया। किसी भी अखबार ने उनको खलनायक घोषित नहीं किया , जबकि इसके उलट आपके किसी ऐसे आंदोलन पर ध्यान दीजिये:

करणी सेना के आंदोलन की ऊंचाई पर भी, राजपूत समाज के बुद्धिजीवियों के किसी वैकल्पिक दृष्टिकोण को मुख्यधारा के इन मीडिया पोर्टलों पर जगह नहीं दी गयी बल्कि जो बहस हुई वो सिर्फ और सिर्फ इन ऊपर वर्णित समुदायों के लोगों और उनके राजपूत समुदाय के विरुद्ध आधे-अधूरे दूषित सिद्धांतों और कथनों से भरी भरी पड़ी थी | इन चैनलों की रिपोर्टिंग की राजपूतों के खिलाफ भड़काऊ और गलत प्रकृति से राजपूतों के प्रति अलगाव को बड़ी आसानी से महसूस किया जा सकता था| हैरानी की बात है कि सीधे तौर पर राजपूतों से जुड़े और उनके जीवन को प्रभावित कर रहे मुद्दों पर भी मीडिया पोर्टलों पर खुद उन्ही को जगह न देकर उनका दुर्भावनापूर्ण चरित्र चित्रण किया गया और इस तांडव के बीच इन चैनलों पर राजपूतों की पूर्ण असहाय और हाशिएपूर्ण स्थिति को महसूस किया जा सकता था|

इन मीडिया चैनलों पर जान बूझ के जगह दी गयी ऐसे राजपूतों को जो न तो वैचारिक रूप से परिपक्व थे न ही राजपूत समाज की वास्तविक बौद्धिक पीड़ा को इस तरह दुनिया के सामने रख सके जिस पर एक स्वस्थ बहस की शुरुआत होती और बॉलीवुड के इस भौंडे खेल का पर्दा फाश होता| ऐसा नहीं है कि इस तरह के लोग राजपूत समाज से इन चैनल्स पर बुलाये नहीं जा सकते थे, परन्तु जब इन चैनल्स में बैठी राजपूत विरोधी लॉबियों की वास्तविक मंशा राजपूतों का मखौल उड़ाना और उन्हें असामाजिक तत्वों के रूप में ही पेश करना हो तो इसमें कोई संशय नहीं की इन चैनल्स पर सिर्फ वो लोग बुलाये गए जो बैठ कर सिर्फ ‘जय राजपुताना’ के नारे लगा कर या किसी की नाक काटने की बात कह कर इन लॉबियों के जाल में फंसते चले गए| कुछ गुर्जरों ने उसी दौरान किसी स्कूल बस पर पत्थर फेंके और इन लॉबियों ने उस घटना को राजपूत आंदोलन का हिस्सा बता कर पूरे के पूरे राजपूत समुदाय को पत्थरबाज और गुंडे करार दे दिया | क्या इस देश में किसी भी और समाज के लिए भी ऐसा होता? ये वही लॉबी हैं जो हरियाणा में आरक्षण आंदोलन में हुए बलात्कारों की बात पर पर्दा डाल देती हैं|

“राजपूत अत्याचारी हैं, किसी लायक नहीं हैं ,लेकिन उनका इतिहास हम हड़प लेते हैं “:

इस लेख को जाट लेखक, मनिंदर डबास ने इंडियाटाइम्स में लिखा है

लेकिन आप देखिये कि वही जाट बाप्पा रावल, अनंगपाल तोमर, पृथ्वीराज चौहान को जाटलैंड डॉट कॉम पर जाट होने का दावा करते मिल जायेंगे।

सिक्ख जट्टों को लें , चाहे उनके आम आदमी हो या बड़े-बड़े लेखक इतिहासकार, डोगरा राजपूतों को शर्मिंदा करने से कभी पीछे नहीं हटेंगे, ये कह के कि उन्होंने रणजीत सिंह को धोखा दिया था और उनके शानदार सिख साम्राज्य को नष्ट कर दिया था। वे खालसा राज के पतन के लिए जिम्मेदार कारण आपको बताएँगे — “डोगरा देशद्रोह” , न कि जिंदन कौर और सरदार लाल सिंह (मुखबिर) के बीच के प्रेम सम्बन्धों , या उनके खुद के राजकुमारों की लड़ाइयों को, जो कि वास्तविक कारण रहे, लेकिन वही सिक्ख, महाराजा गुलाब सिंह डोगरा के राजपूत जनरल जोरावर सिंह कहलूरिया (एक चंदेल राजपूत) की उपलब्धियों को अपना बताते नहीं चूकेंगे ।

कहते चलें कि सिक्ख धर्म के राजपूत योद्धाओं और सिक्ख गुरुओं को शरण देने वाले राजपूतों का इतिहास कभी आपके सामने नहीं आने दिया जायेगा, सिक्खों का मतलब मीडिया और फिल्मों में सिर्फ जट्ट सिक्खों से लिया जाता है , वही परोसा जाता है |

राजपूत पहचान को हड़पने का काम आर्य समाज के समय से चला आ रहा है, जब कोइरी जाती को कुशवाहा / कछवाहा बनाया गया था, मुरव जाति को मौर्य (मौर्य वंश जो अभी भी राजपूतों में मौजूद है) लिखने के लिए प्रोत्साहित किया गया था। तेली समुदाय को राठौड़ पहचान लेने के लिए प्रोत्साहित किया गया था और वास्तव में आरएसएस ने भी वीर दुर्गा दास (करनोत राठौड़ ) को तेली नायक के रूप में पेश करने का प्रयास किया था जब तक कि राजपूतों ने उनके इन षड्यंत्रों का पर्दा फास कर उन्हें पीछे हटने पर मजबूर न कर दिया |

इसी प्रकार, आर्य समाजियों ने राव बहादुर बलबीर सिंह, रेवाड़ी के अहीर जमींदार को 1910 में अहीर यादव क्षत्रिय महासभा की स्थापना करने के लिए उकसाया ताकि पूरी अहीर जाति के लिए राजपूतों के यादव /यदुवंशी की पहचान को हड़पा जा सके | तब से, यादव नाम अहीरों के साथ जोड़ा जाने लगा। राजनीति और मीडिया दोनों में अहीर कार्यकर्ताओं द्वारा खुले तौर पर राजपूत समुदाय और राजपूत सार्वजनिक हस्तियों (खेल हस्तियों समेत) के खिलाफ शातिर प्रचार करना कोई असामान्य बात नहीं है।

विकिपीडिया पर आपको करौली का राज्य अहीरों का लिखा मिल जाये तो चौंकिएगा नहीं | (विकिपीडिया पर कुछ भी लिखा जा सकता है उसको प्रामाणिक न मानें )

Taken from an Ahir Page. From 1920s, the Aheers have been aggressively appropriating the past of Jadaun/Yadav Rajputs of Bayana-Braj-Karauli

हाल ही में, The Print.in के दिलीप मंडल और ज्योति यादव, जो कि समाजवादी पार्टी के लिए अहिरवाड के खुल्लेआम धड़ल्ले से लिखने वाले अति उत्साही चीयरलीडर्स हैं, क्रिकेटर रवींद्र जडेजा की खुद को राजपूत लिख देने वाली एक छोटी सी पोस्ट से बहुत आहत हुए । ये उन्हें इतना नागवार गुजरा कि उन्होंने सारे राजपूतों पर उन्ही घिसे पिटे आरोपों के साथ तीखा हमला किया और मीडिया पोर्टल के अध्यक्ष — शेखर गुप्ता द्वारा उनके इस कुत्सित प्रयास में उनका समर्थन किया गया। हालाँकि, राजपूतों के प्रति उनकी गहरी घृणा के बावजूद, वही अहीर कार्यकर्ता मध्य भारत के गुजराती हैहयवंशी कलचुरि के जडेजा और चुडासमा, ब्रज (करौली और जलेसर) के जादौन यदुवंशी राजपूत वंशों के इतिहास को अपना बताने से खुद को नहीं रोक पाते हैं । इस खेल में उनके प्रिंट और डिजिटल दोनों प्रोपगैंडा माध्यम शामिल हैं। एक अन्य उदाहरण हैहयवंशी कलचुरि वंश के खानदेश के असीरगढ़ किले के इतिहास को विकृत कर उसे अहीर किला बताने का है| ये सब दुष्प्रचार करके ये लोग वास्तविक यदुवंशी राजपूतों को उनकी पहचान से दूर रखने का षड्यंत्र करते रहे हैं |

अगर पाठकों को याद है, तो Article 15 बदायूं जाति-हिंसा पर आधारित फिल्म थी। वास्तविक घटना में सभी अपराधी पुलिस वाले अहीर थे, जो किसी तरह समाजवादी पार्टी के कथित प्रभाव के कारण जमानत पर छूट गए थे। लेकिन बॉलीवुड के अनुभव सिन्हा ने इसमें भी अभियुक्त पुलिस वालों की पहचान बदल दी और राजपूत पुलिस वाले का किरदार घुसा कर दोष उस पर मढ़ दिया | तो ये है वो स्तर जिस पर अहीर समुदाय को लेफ्ट, राइट , अम्बेडकरवादी और मीडिया और सिनेमा सभी में प्रोत्साहन दे के पुचकार के रखा गया है|

वैसे जो सवाल जडेजा पर उठाये गए वो कभी किसी रणदीप हुड्डा या विजेंद्र सिंह या धर्मेंद्र पर नहीं उठाये जाते जब वो सार्वजनिक मंचों से या सोशल मीडिया से खुल्लेआम जाट होने पर गर्व होने की बात करते नजर आते हैं या जाट संसद की बधाई देते हैं | लेकिन कोई जडेजा खुद को राजपूत लिख के किसी आम राजपूत को इन लॉबियों के फैलाये दुष्प्रचार के बीच खुद की थाती पर गर्व करने का या प्रोत्साहित होने का मौका दे दे, ये इनसे कैसे सहन हो सकता है? इस देश में इन सब लोबीयों को सिर्फ आत्मग्लानि से भरा हुआ और क्षमाप्रार्थी राजपूत ही पसंद है जो इनके द्वारा विकृत रूप में प्रस्तुत किये गए इतिहास के किसी काल्पनिक खंड के लिए ग्लानि से भरा हो|

इस बात पर जरूर विचार करें कि आज का राजपूत एक आत्मविश्वास से भरे हुए युवक के रूप में समाज में स्थापित नहीं हो पा रहा है तो कहीं न कहीं उसका कारण ये दूषित इतिहास चित्रण एवं उससे जुड़ा रात -दिन किया जाने वाला दुष्प्रचार है जो जन्म लेने के साथ उसकी स्कूल की किताबों से लेकर उसके सार्वजनिक जीवन के हर स्तर पर इस तरह से भर दिया गया है कि वो सिर्फ एक ग्लानि से भरा जीवन जिए पुरखों के किये किसी काल्पनिक अपराध के लिए,और कभी छाती चौड़ी करके अपने पूर्वजों पर गर्व महसूस न कर सके और समाज का नेतृत्व अनवरत रूप से इन तथाकथित पीड़ित लोगों की बपौती बना रहे | क्या ये उसके मानवाधिकार का उल्लंघन नहीं है?

इन सब का नतीजा ये है कि जहाँ बाकी सब जातियों-समुदायों के लोग खुल कर अपनी काल्पनिक विरासत का ढिंढोरा पीटते है और खुल्लेआम उसका प्रदर्शन करते है, वहीँ जिनका सबसे अनुकरणीय इतिहास रहा है ,उस राजपूत समाज का कोई व्यक्ति यदि किसी भी क्षेत्र में सफलता अर्जित कर भी लेता है तो भी वह कभी खुद को राजपूत कह कर अपने समाज को आशा की किरण देने से पहले ये सोचता है कि खुद को राजपूत कहते ही उस पर जातिवादी होने का ठप्पा इन लॉबियों द्वारा लगा दिया जाएगा| मजे की बात ये है कि ये मापदण्ड सिर्फ राजपूतों के लिए रखे गए हैं |

एक तरफ ये वामपंथी जहाँ राजपूतों को गालियां देते नहीं थकते वहीँ राजपूत महापुरुषों को अन्य जातियों के योद्धाओं के रूप में स्थापित करने में ऐड़ी चोटी का जोर लगा देते हैं और उनके इस तरह के दुष्प्रचारों को इतिहास का प्रमाण पत्र पकड़ा देते हैं| लेकिन यहाँ गौर करने वाली बात ये है कि ऐसा करते समय तथाकथित राइट विंग के हिंदुत्ववादी भी इसी विचारधारा के पोषक हो जाते हैं, लेफ्ट और राइट विचारकों का ऐसा मिलन और किसी जगह आपको नहीं मिलेगा |

एक उदाहरण लें पूर्वी राजस्थान और एनसीआर में क्षेत्रीय रूप से सशक्त गुज्जर जाती का, जिन्होंने प्रतिहार/परिहार राजपूतों का इतिहास हड़पने में कोई कमी नहीं छोड़ी है, जबकि के. एम्. मुंशी और दसरथ शर्मा जैसे इतिहासकार तथ्यात्मक रूप से एक क्षेत्र विशेष के निवासियों के लिए प्रयुक्त होने वाले शब्द ‘गुर्जर’ और एक जाती विशेष के लिए प्रयुक्त होने वाले शब्द ‘गुज्जर’ के बीच का फर्क सिद्ध कर चुके हैं लेकिन वामपंथी सतीश चंद्रा, भंडारकर और बी. डी. चट्टोपाध्याय जैसे लेखकों ने इस पूरे प्रकरण को संशयात्मक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी ताकि राजपूत इतिहास को हड़पने के लिए एक और जाती को दुष्प्रोत्साहन दिया जा सके|

Gujjar Community appropriating History of Parihar Rajputs

अतः इस बात में अब आप लोगों को कोई संशय नहीं रह जाना चाहिए की इन पढ़ी लिखी जातियों के लोगों द्वारा चाहे वो वामपंथ का हिस्सा हों या दक्षिणपंथ का, अपने चाहे राजनैतिक संगठन हों या मीडिया समूह हों या इनके अकादमिक समूह हों, का प्रयोग क्षेत्रीय रूप से मजबूत इन जातियों को पालने-पोषने और पुचकारने के लिए और राजपूतों को हतोत्साहित एवं अन्य समाजों से दूर करने के लिए ही किया जाता है |

इतिहास चोरी की बानगी — किस तरह इन जातियों के हर तबके के लोग शामिल हैं — -एक रिटायर्ड आर्मी कर्नल का दृष्टिकोण उदाहरण के लिए |

परन्तु अब हम बात करेंगे हमारे खुद के समाज की उन कमियों एवं कारणों की जो हमारे अंदर न होती तो हम फिर भी शायद ये सब झेल जाते|

हमारी खुद की भूलें

सवाल ये उठता है कि ये सब दुष्प्रचार क्यों बदस्तूर जारी है? इसका उत्तर आपको मिलेगा हामरी दो प्रमुख कमियों में:-

पहली है हमारे समाज में बौद्धिक अंतर्दृष्टि एवं चेतना की कमी, दूसरी है सामाजिक उत्थान के मुद्दों के लिए संस्थागत रूप से संगठित होने की उत्कंठ आकांक्षा की कमी |

बौद्धिक चेतना की कमी का कारण हम ढूंढें तो वो मिलेगा हमें हमारी अति आदर्शवाद और अति रूढ़िवादिता से चिपके रहने की आत्मघाती प्रवृतियों में, तर्क से दूरी बना लेने की प्रवृति में और समयानुकूल सामाजिक राजनैतिक दृष्टिकोणों से अनभिज्ञ बने रहने और खुद को कटा हुआ रखने की प्रवृत्ति में |

संस्थागत रूप से संगठित होने की कमी का एक कारण जहाँ हमारा जनसंख्यात्मक रूप में बिखराव माना जा सकता हैं परन्तु उससे कहीं बड़ा कारण है — हमारे कुलीन एवं मध्यम वर्ग की आत्म केंद्रित जीवन जीने की प्रवृत्ति|

जम्मू से लेकर मालवा तक देश में फैले राजपूत समाज के उच्च माध्यम वर्ग की राजनैतिक अज्ञानता से बड़ा कारण हमें कुछ और समझ नहीं आता| ये अज्ञानता इस बात से साबित है कि आज तक राजपूत समाज ने कभी ये तक कोशिश नहीं की कि सिविल सोसाइटी तक पहुंचा जाए और अपनी बात लोगों तक फैलाई जाए, बौद्धिक विचारकों के वित्त पोषित समूह एवं संस्थाएं बनायीं जाएँ और दशकों से एक सुनियोजित तरीके से जो राजपूत समाज को हाशिये पर धकेला जा रहा है और अन्य समाजों से इसे काटकर रखा जा रहा है, उसका प्रतिकार किया जाए |

बिखरी हुई जनसंख्या के कारण आने वाली कठिनाइयाँ नगण्य हो जाएँ अगर सभी क्षेत्रों और वर्गों (धनाढ्य, मध्यम,गरीब) के राजपूत सामाजिक और राजनैतिक चेतना से पूर्ण हों |

परन्तु राजपूत समाज को प्रभावित कर रहे और भविष्य में प्रभावित करने वाले मुद्दों के प्रति हमारे समाज में अज्ञानता और उदासीनता का जो आलम है उसे पता करना हो तो कुछ ऐसे मुद्दे किसी राजपूत पत्रकार या राजपूत अकादमिक व्यक्ति के पास लेकर चले जाएँ, जो पहली प्रतिक्रिया आपको मिलेगी वो होगी भौंचक्केपन की…हमारे समाज के मुद्दों से बिलकुल अनभिज्ञ मिलेंगे ये सब|

मैं खुद ये मुद्दे सोशल मीडिया के उन मौजिज राजपूतों के पास ले जाकर देख चूका हूँ जो कि सामयिक मुद्दों जैसे सेकुलरिज्म आदि पर काफी वैचारिक एवं तार्किक समझ रखते हैं और रात-दिन लिखते रहे हैं , पर जब बात राजपूत समाज की आती है तो एक नृजातीय समूह (एथनिक आइडेंटिटी )के रूप में हमारे मुद्दों पर अज्ञानता के फैलाव के फैलाव का जो दायरा है, उसमे ये सब समूह (चाहे राजपूत पत्रकार हों, लेखक हों या राजनेता हों ), ऐसा लगता है जैसे आगे की पंक्ति में खड़े रहने की एक दूसरे से होड़ लगाए खड़े हैं|

और गहराई में जाएँ तो हमारा अति आदर्शवाद हमें राजपूत आइडेंटिटी पर आधारित राजनैतिक विचारधारा रखने, उसपर बहस करने, उसको आगे बढ़ाने से रोकता है | हम पार्टी आधारित राजनीति पर सारा दिन बहस करते रहते हैं लेकिन कितने राजपूत परिवारों में राजपूत आइडेंटिटी आधारित राजनैतिक सोच पर विचार किया जाता है ? क्यों हम जाटों की तरह पार्टी विहीन, सिर्फ जाती आधारित राजनीति नहीं डिसकस करते | मुख्यतः उच्च माध्यम वर्गीय राजपूत परिवारों की बात करें (मैं खुद जिस तरह के परिवार से आता हूँ) , वहां राजपूत आइडेंटिटी आधारित राजनैतिक समझ रखने पर तो जैसे पाबंदी है , पता नहीं कैसा आदर्शवाद है कैसी पार्टी भक्तियाँ हैं | जबकि हम ऊपर ये उल्लेख कर चुके हैं कि किस तरह इस देश की राजनीती चाहे वो लेफ्ट की हो या राइट की, जम्मू की हो या कन्याकुमारी की, सिर्फ और सिर्फ आइडेंटिटी बेस्ड ही है |

राजपूतों को कुछ सवाल जो खुद से पूछने चाहिए :-

1 . जब सब इतिहास कार इस बात पर सहमत हैं कि राजा जयचंद पर जो गद्दार की छवि लगी हुई है वो ऐतिहासिक साक्ष्यों में गलत साबित होती है, तो क्यों ऐसा है कि सिर्फ जयचंद या मान सिंह कछवाहा को देशद्रोही के रूप में उदबोधित किया जाता है? कौन है ये लोग जो अभी तक इस छवि को अपने हितों के लिए बरक़रार रखे हुए हैं ? क्यों इसका शुद्धिकरण नहीं किया जाता ? ये तथाकथित हिंदुत्ववादी राइट लॉबी किसी शाहाजी, किसी मालोजी,किसी सिक्ख गुरु के मुग़ल मनसबदार होने को नहीं सामने लाती ? क्यों सिर्फ राजपूत उदाहरण ही प्रस्तुत किये जाते हैं?

2. कौन हैं वो लोग जिन्होंने राजपूतों की ये छवि बनायीं है कि ‘वो सिर्फ मुग़लों को बेटियां ब्याहते थे , सिर्फ हारते थे , अंग्रेजों से कभी लड़े नहीं ‘-क्यों कभी ये मराठा और दक्कन के सुल्तानों को ब्याही उनकी बेटियों की बातें नहीं करते? सिर्फ कुछ राजपूत उदाहरण देकर, मुसलमानो से ब्याही अनगिनत जाट -जट्ट , ब्राह्मण, अहीर औरतों की घटनाओं पर पर्दा डाल देते हैं? जबकि ये सब तथ्य ऐतिहासिक रूप से प्रमाण सहित लिखित रूप में उपलबध हैं |

3 . क्यों हमारा समाज लेफ्ट और राइट दोनों तरफ के निशाने पर है ?

4 क्यों लेफ्ट और राइट दोनों के लोग सिर्फ और सिर्फ राजपूतों को शर्मिंदा करने की कोशिशों में लगे हुए हैं चाहे वो डिजिटल/ प्रिंट मीडिया का प्रयोग करके हो या फिल्मों का, जबकि वही लोग अन्य जातियों को हमारी पहचान हड़प लेने के लिए दुष्प्रेरित करते रहते हैं ?

5 . क्यों राजपूतों को हर जगह सिर्फ हारने वाले बतया जाता है और मराठाओं और सिखों को विजेता?

6 . क्यों ऐसा होता है कि राजपूतों की उत्त्पत्ति के बारे में इतना अधिक संशय फैलाया जाता है,उसको इतना अधिक विवाद का विषय बनाया जाता है , स्कूलों के पाठ्यक्रम तक में ये बताया जाता है कि राजपूतों की उत्त्पत्ति के बारे में संशय है, राजपूतों को मिश्रित नस्ल का बताते हैं, जबकि पुराने क्षत्रियों से राजपूतों की समानता और पूरे उत्तर भारत में क्षत्रियों के राजपूतों के रूप में उदभव को एक शताब्दी से भी पहले इतिहास कार कुमार छेदा सिंह वर्मा द्वारा प्रामाणिक रूप से स्थापित किया जा चुका है ?

फिर भी ये दुष्प्रचार नहीं थमता, उदाहरण के लिए प्रोफेसर हरबंश मुखिया का ये लेख पढ़ें | यहाँ यह उल्लेखनीय है कि ये प्रोफेसर वामपंथ की और झुकाव वाले पंजाबी ब्राह्मण हैं |

7 . क्यों बड़गुजर और प्रतिहार राजपूतों की उत्त्पत्ति को गुज्जर जाती से बार बार जोड़ने का प्रयत्न किया जा रहा है ? जबकि इतिहासविद के. एम्. मुंशी (जो खुद एक ‘गुर्जर’ ब्राह्मण हैं ) -ये सिद्ध कर चुके हैं कि मंथनदेव के राजोर अभिलेख में प्रयुक्त ‘गुर्जर’ शब्द स्थान सूचक है|

ये फर्जी इतिहासकार तो गुर्जर -प्रतिहार(गुर्जर प्रदेश के प्रतिहार -आज के बड़गुजर राजपूत ) और प्रतिहार साम्राज्य के प्रतिहारो(मध्य भारत के आज के परिहार राजपूत )को भी एक बनाये बैठे हैं| कहीं ऐसा तो नहीं कि चाल ये हो कि जितना ज्यादा संशय पैदा किया जाएगा, राजपूतों की उत्त्पत्ति की तरह, उतना ही प्रतिहार इतिहास चुराने में आसानी होगी |

अंत में, यदि सम्पन्न राजपूत वर्ग ( पुराने रियासतदार, व्यवसायी, ब्यूरोक्रेट्स, पत्रकार , उच्च मध्यम वर्ग) समाज के लोकतांत्रिक अधिकारों तक के लिए खड़े नहीं हो सकते और अपनी बुद्धिमत्ता और संसाधनों का प्रयोग करके उस प्रोपगैंडा का प्रतिकार नहीं कर सकते जिसका सबसे बड़ा भुगतभोगी गरीब आम राजपूत है, तो दुखी मन से सिर्फ इतना ही कहेंगे कि शायद राजपूत समाज अपने अस्तित्व का ही अधिकारी नहीं है |

Published by voiceofrajputs

In the Past 30 years or so, the community has witnessed decline- socially, economically and politically, one of the root causes of this multifaceted decline being - the Intellectual decline & alienation of the Community. Hence an attempt to rectify it.

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