क्षत्रिय इतिहास के राजनीतिकरण पर समाज को मेसेज (A Message to Kshatriya Samaj on Politicization of Ethnic History)

Siddhartha Singh Gautam ✍️

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Lord Buddha, ancestor of Gautam Rajputs of Argalvansh

राजस्थान में हल्दीघाटी और महाराणा प्रताप जी को लेकर चल रही उथल-पुथल पर दो दिन पूर्व एक भाई ने लेख लिखने को कहा था। अव्वल तो सुशांत सिंह राजपुत्र की मृत्यु पर समाज की प्रतिक्रिया देखकर क्षत्रिय समाज के प्रति हृदय जुगुप्सा से भर गया है इसलिए कुछ भी लिखने की इच्छा नहीं होती। दूसरी बात हम सिर्फ महाराणा प्रताप जी पर ही क्यों उद्वेलित होते हैं?

निःसंदेह महाराणा प्रताप जी का संघर्ष प्रणम्य है सम्पूर्ण विश्व में उनके जैसा कोई दूसरा उदाहरण नहीं यदि भगवान श्रीराम की वीरता और संघर्ष से कलयुग के किसी व्यक्ति की तुलना की जा सकती है तो उसी इक्ष्वाकु कुल में जन्में सिर्फ महाराणा प्रताप जी से, जिन्होंने भगवान श्रीराम की भांति ही वर्षों अरण्यों में खाक छानी लेकिन कभी स्वाभिमान को झुकने नहीं दिया।

पर क्षत्रिय इतिहास सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है हमारा हज़ारों वर्षों का लिखित इतिहास है हम क्यों कभी मौर्यों(वर्तमान के सब्जी उगाने वाले मुराई नहीं) पर उद्वेलित नहीं होते जबकि आज भी हम ठाकुरों में मौर्य वंश पाया जाता है ? बिना तलवार उठाये दुनिया जीतने वाले क्षत्रियों के शाक्यवंश में जन्में गौतम कुल के सिद्धार्थ गौतम(बुद्ध) को तो हम विस्मृत ही कर चुके हैं जबकि मैं स्वयं शाक्यवंश के उसी गौतम कुल में जन्मा हूं, यादव(वर्तमान के अहीर, यादव नहीं हैं) क्षत्रियों को बताना पड़ता है कि तुम यदु के वंशज हो I उन्हें यही ज्ञात नहीं कि वो श्रीकृष्ण की महान यदुकुल श्रृंखला से सम्बंध रखते हैं इनका ये हाल है कि अपने नाम में यादव लिखने में आज इन्हें लज्जा आती है जिसका परिणाम ये है कि ग्वाले, यदुवंशी बने घूम रहे। कटोच और राष्ट्रकूटों का तो खैर इन्होंने नाम ही क्या सुना होगा? इस पर बात करना ही फिजूल है। वो तो शुक्र मनाओ की कटोच और राष्ट्रकूट क्षत्रिय वंशों पर अब तक किसी जाति ने दावा नहीं ठोंका ? जिन अरबों ने महज 70 वर्ष में इस्लामिक तलवार के बल पर आधी से ज्यादा दुनिया की मूल संस्कृति का उच्छेदन कर दिया था उनके सम्मुख 400 वर्ष दीवार बनकर खड़े होने वाले प्रतिहार वंश के सम्राटों के नाम में गूजर संलग्न कर दिल्ली में मार्गों-चौराहों का नामकरण होता है यहां तक नोएडा का दीन दयाल उपाध्याय पुरातत्व विभाग नेताओं के दबाव में प्रतिहार वंश के राजपूत सम्राटों के नाम से प्रतिहार हटाकर गूजर लिखता है I

हम उद्वेलित नहीं होते, श्रावस्ती नरेश सुहेलदेव बैस को वोटबैंक के लिए नेताओं द्वारा राजभर बना दिया जाता है क्षत्रियों को फर्क नहीं पड़ता महापुरुष तो जैसे हमारे यहां पेड़ में उगते हैं। हम जैसे कुछ लोग बोलें भी तो तुरंत इनका हिंदुत्व खतरे में पड़ जाता है। ये संघियों की राजनीति के इतने गुलाम हो चुके हैं की स्वयं के बाप को बाप कहने से भी डरते हैं। जब लोकस्मृतियां बदल जाती हैं तो इतिहास से स्नातक और हिंदी साहित्य के प्रोफेसर Dr. Kumar Vishwas जैसे शिक्षित व्यक्ति भी एक चौहान क्षत्राणी माँ पन्ना को फेसबुक जैसे सार्वजनकि मंच पर गूजर बता देते हैं। इस देश के इतिहासकार एक कवि की कविता में अलंकारिक भाषा के रूप में प्रयुक्त “अग्निवंश” शब्द से इतने ऑब्सेस्ड हैं कि इतिहास की पुस्तकों में “राजपूतों की उत्पत्ति” नाम से एक पृथक अध्याय पढ़ाया जाता है जिसमें व्यक्ति के मस्तिष्क में संशय उत्पन्न करने वाली अग्निवंश की मनगढ़ंत थ्योरी पर ऐसी डिबेट मिलेगी की पृथ्वीराज चौहान और मिहिरभोज प्रतिहार आज होते तो इनकी विक्षिप्तता देखकर अपना ही माथा पीटने लगते। चन्द्रबरदाई की कविता में जिन चार वंशों के लिए【प्रतिहार,परमार,चालुक्य(सोलंकी),चौहान】 अग्निवंश शब्द का प्रयोग हुआ है उनमें से किसी भी वंश के राजा ने कभी स्वयं को अग्निवंशी कहा ही नहीं। मैं इस देश के तथाकथित इतिहासकारों को चुनौती देता हूं कि चन्द्रबरदाई के पृथ्वीराजरासो से इतर एक भी शिलालेख बताएं जिसमें इन चार वंशों के किसी भी सम्राट ने स्वयं को अग्निवंशी अभिहित किया हो। तथाकथित अग्निवंश का पर्याय बन चुके चौहानों के शिलालेख छठवीं शताब्दी से मिलने लगते हैं जिनमें उन्हें सूर्यवंशी लिखा है जबकि यदि चन्द्रबरदाई को पृथ्वीराज चौहान का समकालीन भी मान लें(मैं नहीं मानता) तो भी पृथ्वीराज रासो 12वीं सदी में लिखी गई होगी फिर अलंकारिक शब्द ‘अग्निवंश’ की कपोल कल्पना को इतिहास बनाकर क्यों आगे बढ़ाया गया?

जब सम्राट अशोक से महाभारत के युधिष्ठिर को ज्ञान दिलाने वाली रोमिला थापर जैसे वामियों ने अपनी क्षुद्र राजनीति के लिए क्षत्रियों के गौरवशाली अतीत सोमवंश, दिखित, गौतम,बैस,सेंगर,मौर्य,मल्ल(विसेन) जैसे प्राचीन क्षत्रिय वंशों से पृथक “अग्नि से राजपूतों की उत्पत्ति” का शिगूफा बनाया तो इस पर क्षत्रियों का रक्त क्यों नहीं उबला? अग्निवंश सुनने में बहुत कूल लगता है क्या? जबकि चारों वंश के सभी शिलालेखों में इन्हें सूर्यवंशी क्षत्रिय अभिहित किया गया है। रामायण-महाभारत जैसे महाकाव्यों से इतर क्षत्रिय पर्याय के रूप में इतिहास में सर्वप्रथम राजपुत्र शब्द का प्रयोग हर्षवर्धन बैस ने अपने लिए किया है जिनके विशाल सम्राज्य के पतन के उपरांत अनेक छोटे-छोटे स्वतंत्र क्षत्रिय राज्यों का अभ्युदय हुआ जिसे ये वामी एक एजेंडे के तहत आज तक अग्नि से राजपूतों की उत्पत्ति बताकर परोसते आ रहे हैं। इनके अनुसार पृथ्वीराजरासो में मोहम्मद गोरी की 17 बार पराजय का वर्णन मिथ्या है क्योंकि मोहम्मद गोरी और पृथ्वीराज चौहान के मध्य दो युद्धों के अतिरिक्त कोई प्रमाण नहीं मिलते तो मूढ़ों अग्नि से इंसानों की उत्पत्ति के प्रमाण तुम्हें कहां मिल गए? हमारे पूर्वांचल में आज भी क्षत्रियों को पता तक नहीं वामियों की ये ‘राजपूत उत्पत्ति’ क्या बला है? क्षत्रियों को रोष प्रकट करना है तो सर्वप्रथम इतिहास के इस पक्ष पर रोष प्रकट करे।
फिर मुग़लों से वैवाहिक सम्बन्धों को एकतरफा पढ़ाया गया जिसका परिणाम ये है कि आज Rachit भैया जैसे विद्वान व्यक्ति जिन्होंने परास्नातक इतिहास विषय से किया है संघियों का विरोध करने के लिए अपनी पोस्ट में”सुलह कुल नीति के तहत पहले मुसलमानों को दामाद बनाएंगे फिर बाद में उन्हें ही धोखा देंगे” जैसा मारक व्यंग प्रयोग करते हैं ये व्यंग्य भैया ने क्षत्रियों के प्रति किसी दुर्भावना के तहत नहीं किया था पाठ्यक्रम में हस्तक्षेप द्वारा वामियों ने हमारी मानसिक कंडीशनिंग ही ऐसे की है। मुझे भैया के “बाद में धोखा देंगे” वाक्य से पीड़ा हुई थी वैवाहिक सम्बन्धों पर नहीं क्योंकि क्षत्रियों से पूर्व मुसलमानों को दामाद तो ब्राह्मणों ने ही बनाया, और इस पर मैंने भैया को टोंका भी था जिन क्षत्रियों के नैतिक मानदंड इतने ऊंचे रहे हो कि निहत्थे शत्रु पर हमला करने से बेहतर मर जाना पसंद करता रहा हो वो किसी को धोखा देगा? भैया जैसे विद्वान व्यक्ति की वाल पर ये वाक्य पढ़कर मैंने ठान लिया था कि अब अपने इतिहास विकृतिकरण पर शांत नहीं रहूंगा ये शिक्षित और एलीट क्षत्रिय वर्ग की चुप्पी का ही परिणाम है कि आज हर दूसरा व्यक्ति इतिहास की हर चर्चा पर क्षत्रियों को सायास लज्जित करता है। मुझे व्यक्तिगत राजघरानों के वैवाहिक सम्बन्धों से कोई समस्या नहीं पर आम क्षत्रिय जिसे इतिहास की जानकारी नहीं है इन सम्बन्धों को लेकर शर्मिंदा होता है। राष्ट्र और धर्म पर होने वाले हर आक्रमण को जिन क्षत्रियों ने हज़ारों वर्ष सबसे पहले अपने वक्ष पर झेला हो जिनकी तलवारों के जौहर का परिणाम है कि महज 70 वर्ष में तलवार के बल पर आधी से अधिक दुनिया का इस्लामीकरण कर देने वाली बर्बर तलवार का 600 वर्ष दिल्ली में शासन होने के उपरांत भी भारत का कभी पूर्ण इस्लामीकरण नहीं हो सका उन्हीं वीर क्षत्रियों को आज के तथाकथित हिन्दुवादी मुग़लपुत कहते हुए मिल जाएंगे। चिरकाल से स्त्री सम्प्रदान पर ही पोषित 400 वर्ष दक्कनी सुल्तानों की गुलामी करने वाले मराठों,ब्राह्मणों,जाटों से लेकर मेरे पास सभी स्वघोषित वीर जातियों के प्रमाण मौजूद हैं लेकिन मैं क्षत्रिय हूं नीचता मेरे स्वभाव में नहीं है भाजपा शासन में पैदा हुए इन स्वघोषित वीरों के विपरीत क्षत्रियों के मुग़लों से बकायदा दोतरफा वैवाहिक सम्बन्ध हुए हैं जितना सच जोधा बाई है उतना ही सच अकबर की भतीजी बीबी मुबारक, अकबर ने भी अपनी भतीजी का विवाह मान सिंह से किया था राणा प्रताप जी के तीन भाई उदय सिंह की मुस्लिम पत्नियों से थे, बाबर ने अपनी बेटी और हुमायूं ने अपनी भतीजी का विवाह रजौरी के छिब क्षत्रियों में किया था महाराज छत्रसाल बुंदेला की बेटी मस्तानी मुस्लिम पत्नी से थी जिसका विवाह बाजीराव से हुआ। राजघरानों में राजनैतिक कारणों से सम्बन्ध होते रहते थे आम क्षत्रियों को इसे जातीय अहम का विषय बनाने की आवश्यकता ही नहीं थी।

पर एक एजेंडा के तहत ये सम्बन्ध एकतरफा पढ़ाये गए और क्षत्रियों का रक्त नहीं उबला। संघियों ने अपनी हिंदुत्व की नौटंकी में हज़ारों मन्दिरों का निर्माण कराने वाले आमेर के राजा मान सिंह कच्छवाह को ही इतिहास का विलेन बना दिया और अफीमची क्षत्रिय बड़े हर्ष से उनके इस एजेंडे में योग करते हैं जबकि जाने कितने ही संघी आज मान सिंह कच्छवाह द्वारा बनवाये गए मन्दिरों से अपना पेट पालते हैं इससे ये तो तय है कि क्षत्रिय गद्दार भी हुआ तो आज के पैदा हुए हिंदुत्व के ठेकेदारों को भूखा नहीं मरने देगा।

यदि जड़े न हों तो हवाएं बरगद को भी बहा ले जाती हैं इसलिए क्षत्रिय स्वयं को बुद्धिजीवी और प्रगतिशील दिखाने के लिए जड़ो को काटना बन्द करें और स्वयं को महाराणा प्रताप जी तक सीमित न करके सभी पुरखों के सम्मान में आगे आएं I

Published by voiceofrajputs

In the Past 30 years or so, the community has witnessed decline- socially, economically and politically, one of the root causes of this multifaceted decline being - the Intellectual decline & alienation of the Community. Hence an attempt to rectify it.

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