Rajput History between Appropriation & Alienation — Solution (राजपूत इतिहास एप्रोप्रियेशन और एलियेनेशन के बीच — और उसका समाधान)

Pushpendra Rana ✍️

मुझे समझ नही आता लोग राजपूत विरोधी विशेषकर लेफ्टिस्ट ट्रोलर्स से बहस करने में अपना वक्त क्यों बर्बाद करते हैं। बहस उससे की जाती है जिसे या तो ज्ञान हो या ज्ञान प्राप्त करने की इक्षा रखता हो। जिस व्यक्ति को या तो ज्ञान ना हो या फिर सिर्फ जानबूझकर चिढ़ाने की नीयत रखता हो ऐसे व्यक्ति से बहस करना अपना समय बर्बाद करना ही है।

लेफ्टिस्ट स्पेक्ट्रम की अगर बाते करें तो राजपूतो के मुद्दे पर प्रोफेशनल हिस्टोरियंस से लेकर सामान्य सोशल मीडिया ट्रोलर्स इसी केटेगरी में आते हैं। एक तो इनका ज्ञान बहुत सीमित है, ऊपर से चिढ़ते हैं या फिर ज्ञान होने के बाद भी जानबूझकर राजपूतो को चिढ़ाने के लिए उल्टा सीधा बोलते हैं। इनका सबका कुछ उदाहरण देता हूँ-

  1. एक तरफ तो ये सब लोग मानते हैं कि राजपूत का मतलब सिर्फ राजस्थान से है(भारत मे बहुसंख्यक आबादी ये ही मानती है यहां तक कि राजपूत भी) लेकिन राजस्थानीयो को टारगेट कर के ही राजपूतो को सदैव हारा हुआ बताएंगे जबकि देश मे अकेले राजस्थान के राजपूत हैं जिन्होंने अरबो के आक्रमण से लेकर अंग्रेजो तक लगातार 1300 साल तक राज किया है वो भी सबसे ज्यादा वल्नरेबल होने के बावजूद जिसकी मिसाल इतिहास में दुनिया के किसी कोने में नही मिल सकती।

2. ये लोग राजपूत का मतलब सिर्फ राजस्थान से मानेंगे लेकिन ये भी बोलेंगे कि राजपूतो के कारण ही देश पर मुसलमानो का अधिपत्य हुआ जैसे रक्षा करने का भार सिर्फ राजस्थानियों पर था।

3. ये लोग हिन्दूशाही आदि वंशो को कभी ब्राह्मण, कभी जाट गूजर आदि बताएंगे लेकिन जब मुस्लिम आक्रमण से लड़ने की बात होगी तो खामोश हो जाएंगे।

4. ये लोग प्रतिहार वंश, तंवर वंश, सोलंकियों आदि को जाट गूजर वगैरह बताएंगे लेकिन इनकी हार को राजपूतो की हार बताएंगे।

5. चंदेल, बुंदेला आदि आदि को आदिवासी मूलनिवासी बताएंगे और खजुराहो के मंदिरों का श्रेय लेंगे लेकिन इनकी हार को राजपूतो की हार बताएंगे।

6. राजपूतो के हजारों साल के इतिहास के बावजूद राजपूतो को सदैव हारा हुआ और कायर बताएंगे लेकिन सौ साल के इतिहास के आधार पर मराठो को हिन्दुओ का saviour बताएंगे, 1600 से पहले मराठे कहाँ थे और कौन थे ये नही बताएंगे।

7. सिर्फ पंजाब पर 40 साल राज करने वाले सिक्खों को हिन्दुओ का रक्षक और महानतम योद्धा बताएंगे।

8. एक छोटे से जिले पर मुगलों के अधीन और जयपुर के सहयोग से शासन करने वाले जाटो को उत्तर पश्चिम भारत की महान योद्धा जाति और हिन्दुओ की प्रथम रक्षा पंक्ति बताएंगे लेकिन ये नही बताएंगे कि इनका कौन सा साम्राज्य था और कौन से युद्ध किये थे।

ये subaltern या हिंदूवादी revisionist इतिहास के नाम पर काल्पनिक योद्धाओं का इतिहास लिखेंगे और उनके हारने को resistance के नाम से सेलिब्रेट करेंगे लेकिन राजपूतो को सदैव हारने वाला कहकर चिढाएंगे।

9. ये लोग खुद वामपंथी सेक्युलर लिबरल बनेंगे लेकिन राजपूतो को मुगलों से विवाह संबंध या उनके ally होने पर चिढाएंगे।

ये लोग सेक्युलर वामपंथी लिबरल होकर भी राजपूतो को मुस्लिम शासन के लिए जिम्मेदार बताएंगे और गद्दार बोलेंगे। उस समय इनका सेकुलरिज्म गायब हो जाता है।

10. ये लोग जे एन सरकार जैसे सबसे ईमानदार और ऑब्जेक्टिव इतिहासकार को जिसने कांग्रेस द्वारा भारतीयों को महिमामंडित कर इतिहास लिखने से मना कर दिया था ऐसे इतिहासकार द्वारा औरंगजेब का तथ्यात्मक इतिहास लिखने पर उनको कम्युनलिस्म का वायरस बोलते हैं और इसके पीछे तर्क देते हैं कि उस काल का परीक्षण वर्तमान के मूल्यों से नही करना चाहिए लेकिन खुद अपने आधुनिक मूल्यों का आधार बनाकर राजपूतो को गालियां देते हैं।

ऐसी दुर्भावना और दोगलापन जिन लोगो में है भला उन लोगो से बहस का क्या लाभ? कितनी भी बहस कर लो आप इनका विश्वास नही जीत सकते।

जितना समय इन लोगो से बहस में लगाते हैं उतना पढ़ने और लिखने में लगाइए। जितना आप लिखोगे उतना लाभ होगा।

आज ये जो मंदिर के घंटे की तरह राजपूतो को बजा रहे हैं उसका कारण राजपूतो की कमजोरी है। राजपूत आज सबसे कमजोर जाती है। अगर राजनीति में कुछ ताकतवर भी हैं तो उसका कोई लाभ नही क्योंकि राजपूतो में सामुदायिकता की भावना और राजनीतिक एवं बौद्धिक चेतना जरा भी नही हैराजपूतो में ऐसा कोई इकोसिस्टम नही जो समाज पर हो रहे हमलों और षड्यंत्रों से निपटने और दशा दिशा तय करने का काम करे। ऊपर से ये ब्राह्मणो से भी बड़े हिंदूवादी बनते हैं इसलिए राजपूत इन वामियो के लिए सबसे आसान शिकार हैं। अगर राजपूत ताकतवर और जागरूक होते तो मार खा कर भी ये लोग राजपूतो का गुणगान करते। क्योंकि किसी का तुष्टिकरण या चाट कर किसी को अपना समर्थक या ally नही बनाया जा सकता। समर्थक या ally सिर्फ बलशाली के ही बनते हैं।

राजपूतो की हालत इतनी खराब है कि ट्विटर पर राजपूतो की इतनी छीछालेदर होने पर भी एक भी राजपूत सेलिब्रिटी, बुद्धिजीवी या नेता सामने नही आया। सोच कर देखिए ये अगर किसी और जाति के साथ होता तो।

इसलिए अगर कुछ करना चाहते हैं तो व्यर्थ की बहस के बजाए राजपूतो में सामुदायिकता की भावना और बौद्धिक चेतना के विकास के लिए काम करे। ज्यादा कुछ नही कर सकते तो कम से कम इंटरनेट पर पढ़ने और लिखने पर ही ध्यान दीजिए।

आज मराठा इतिहास लेखन की बेहद समृद्ध धारा है। जिसमे कोई शिवाजी या मराठो के विरुद्ध नकारात्मक नही लिख सकता। लिखता भी है तो दूसरे पक्ष में इतना वृहद लेखन होता रहता है कि वह नक्कारखाने में तूती की तरह दब जाता है। यही हाल सिक्ख इतिहास लेखन का है। 1925 में जे एन सरकार ने शिवाजी का तथ्यात्मक इतिहास लिखा था जिसमे शिवाजी की प्रशंसा की भावना ही थी लेकिन उस समय पूणा के मराठियों ने उनके विरुद्ध बवाल काटा था क्योंकि उसमें शिवाजी का भगवान तुल्य नही प्रस्तुत किया गया था। यह 1925 कि बात है। उस समय विभिन्न इतिहासकार राजपूतो को बिना सबूत के शक हूणों की औलाद बता रहे थे और राजपूतो को कोई मतलब ही नही था।

पूरी सदी बीत गई लेकिन अब तक राजपूतो के इतिहास लेखन की कोई ठीकठाक धारा विकसित नही हुई और उसमे राजपूत विचारधारा के अनुसार लेखन करने वालो की संख्या तो बहुत ही कम है। बल्कि विदेश में बैठे विदेशी ही अज्ञानता के कारण यदा कदा राजपूतो का विकृत इतिहास लिख रहे हैं और अब भी उन्हें ही राजपूत इतिहास पर मानक लेखन बताया जा रहा है। जहाँ इतिहासकार मराठा, सिक्ख, मुगल आदि पर नकारात्मक लिखने से इसलिए बचते हैं कि इससे उनकी प्राथमिक सोर्स तक पहुँच बाधित हो सकती है वही हमारे राजपूत रजवाड़े राजपूतो के खिलाफ लिखने वाले गोरों और बंगालियों को खुशी खुशी अपने आर्काइव तक पहुँच देते हैं वही राजपूत इतिहासकारों को पूछते भी नही।

अकादमिक सर्कल्स में सोशल साइंस में राजपूतो की संख्या बेहद कम है। उसमें भी इतिहास विभागों में तो और भी कम जहाँ राजपूत सबसे ज्यादा होने चाहिए थे। अगर यूपी एमपी बिहार वगैरह की ही बात करें तो जो कुछ राजपूत इतिहासकार हैं भी तो उनमें से ज्यादातर लोगो का विषय राजपूत इतिहास से अलग है, जो राजपूत इतिहास पर लिखते भी हैं तो उनके लिए भी राजपूत इतिहास का मतलब सिर्फ राजस्थान का मध्यकालीन इतिहास है। यूपी जैसे बड़े राज्य में इतिहास विभागो में कुछ राजपूत प्रोफेसरो के होने के बावजूद स्थानीय राजपूत इतिहास पर शोध ना के बराबर है।

Historian, Raghubir Singh Sitamau with Jadunath Sarkar

अब अगर राजस्थान की बात करें तो यहां लोगो में इतिहास को लेकर रुचि रहती है, भाट इतिहास को लेकर गोत्रवाद के चक्कर मे बहुत passionate लड़ाइयां होती हैं, ढोल नगाड़ों तक पर लड़ाई हो जाती है। यहां के इतिहास को देखते हुए राजस्थान की यूनिवर्सिटीयो और कॉलेजो में इतिहास विभागों में राजपूतो का एकतरफा वर्चस्व होना चाहिए था जिस तरह उत्तर भारतीय यूनिवर्सिटीयो के मध्यकालीन इतिहास विभागों में अशरफ मुसलमानो का है, लेकिन यहां भी बुरा हाल है। यूनिवर्सिटीयो की बात की जाए तो जोधपुर को छोड़कर बाकी यूनिवर्सिटीयो के कैंपस के इतिहास विभाग में राजपूतो की संख्या ना के बराबर है। इतिहास विभागों में पिछले 20 साल में ही जितनी पीएचडी हुई हैं उनको निकाल कर देखो तो राजपूतो की संख्या बहुत कम मिलेगी। पिछले साल उदयपुर यूनिवर्सिटी में हिस्ट्री पीएचडी का एंट्रेन्स देने वाले लगभग 300 लोगो मे मात्र 5-6 राजपूत थे जबकि कम से कम 70-80 जाट होंगे जबकि मेवाड़ में जाट बेहद कम हैं। ये तो छोड़िए, अकादमिक सेमिनारों में पेपर प्रस्तुत करने या जर्नल्स में छपवाने के लिये किसी शैक्षणिक योग्यता की जरूरत नही होती। कोई amateur भी पेपर प्रस्तुत कर सकता है। हर साल के सेमिनारों के पेपर्स की लिस्ट निकाल कर देखिए, यहां भी राजपूत इक्का दुक्का ही मिलेंगे।

जो कुछ राजपूत इतिहासकार हैं भी वो ज्यादातर किसी ठिकाने या क्षेत्रीय वंश का मध्यकालीन इतिहास लिखते हैं। एक राजपूत विचारधारा या दृष्टिकोण नाम की कोई चीज नही है जिससे तहत कोई इतिहासकार लिखता हो।

इसीलिए कुछ और करे या ना करें सबसे पहले इतिहास लेखन के क्षेत्र में दखल बढ़ाने की जरूरत है जिसमे कोई सामान्य व्यक्ति भी योगदान दे सकता है। इस ग्रुप में बहुत युवा हैं जो इतिहास में रुचि और अच्छी समझ रखते हैं। ऐसे युवा जो एसएससी या उसके समकक्ष किसी परीक्षा की तैयारी करते हैं उन्हें सलाह है कि Academics में सोशल साइंस में भी कैरियर बनाने को लेकर सोचे। यह क्षेत्र mediocre लोगो से भरा पड़ा है और इसका स्तर लगातार गिर रहा है। इतिहास विभाग में तो अधिकतर ऐसे लोग भरे पड़े हैं जिन्हें ना तो इतिहास की समझ और ना ही रुचि। ऐसे में औसत से बेहतर और इतिहास में रुचि रखने वाले लोगो के लिए कैरियर बनाना बहुत आसान है। अगर प्रोफेशनल इतिहासकार या समाजशास्त्री ना भी बनना चाहें तब भी amateur के रूप में लिखकर भी आप अपने पेपर और किताबे पब्लिश करवा सकते हैं। अगर अगले 5-7 साल में 10-12 राजपूत इतिहासकार या समाजशास्त्री भी हो गए जो लगातार राजपूतो के विषय पर राजपूत दृष्टिकोण से लिखते रहें तो बहुत बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। उसके बाद सक्षम होने पर शोध संस्थान खोला जा सकता है। फिलहाल तो राजपूतो का प्राथमिक इतिहास ही नही लिखा गया है।

Published by voiceofrajputs

In the Past 30 years or so, the community has witnessed decline- socially, economically and politically, one of the root causes of this multifaceted decline being - the Intellectual decline & alienation of the Community. Hence an attempt to rectify it.

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