राजपूतों को ब्राह्मणवाद से उठना होगा

Rajeev S Jadaun (Yaduvanshi) ✍️

Dalibai’s bangal. Dalibai Meghwal, was a sister to Ramdevji Tomar

ब्राह्मण इस देश में छुआछूत और अश्पृश्यता का सबसे बड़ा पोषक है और मूर्ख क्षत्रिय आँख मूंदकर उसके आदेश को क्रियान्वित करने के कारण उस पाप में बराबर का भागीदार है। मेरे पैतृक घर में वर्षों से यह परंपरा है कि आंगन में बजरंगबली का ध्वजा प्रत्येक वर्ष हिंदी कलेंडर के मुताबिक जेठ महीने की एकादशी को बदला जाता है।

परसों जेठ की एकादशी थी तो सत्यनारायण भगवान का पूजा पाठ सम्पन्न हुआ। पूजा के दौरान बाँस के पुराने ध्वजा को निकाल कर नए ध्वजा को स्थापित करने की जब बारी आई तो चूँकि इस बार मैं घर पर ही हूँ तो यह जिम्मवारी मुझे ही मिली। खंती (मिट्टी खोदने का औजार) लेकर ध्वजा की जड़ को खोदने से पहले मैंने एक बारह-तेरह साल का लड़का जो मुसहर जाति से आता है और मेरे यहाँ घरेलू काम करने वाली का पोता है बहुत ही प्यारा बच्चा है उसकी माँ नहीं है तो वह अपनी दादी के साथ ही रहता है अपने सहयोग के लिए उसे आवाज लगाया ताकि मैं मिट्टी खोदूँ और वह मिट्टी निकाले। मेरे आवाज लगाने की देर थी कि पूजा पर बैठे पंडीजी ऐसा फदरने लगे “ऐं उ छौड़बा धाजा छूतै” पंडी जी के इतना कहते ही घर के तमाम लोग मेरे ऊपर टूट पड़े “ई ढ़ेर पैढ़ लिख लेने छै एकरा ते कुछ बुझैये ले नै आवै छै”। पूर्ण बहुमत से लोगों ने मुझे मूर्ख साबित कर दिया। थोड़ा से विरोध के बाद लोगों से ज्यादा बकथोथन करने और लोगों का कोपभाजन सहने के बजाए हम चुपचाप मुड़ी गोंत कर अपने काम पर लग गए।

इकीसवीं सदी में भी छुआछूत इतने सूक्ष्म स्तर पर है यह हमारे मानव होने को शर्मसार करती है। जबकि देखा जाए तो हनुमान लला के ध्वजा के लिए बाँस काटने से लेकर उसे छिलने-माठने तक का काम उस बच्चे का पिता जो कि वह भी मुसहर ही है ने किया। आँगन-दुआर जो कि कथित रूप से असुद्ध था उसे गोबर से नीपकर शुद्ध करने का काम उस बच्चे की ने किया जो कि वह भी मुसहर ही है। यूनिवर्सिटी/कॉलेजों में और फेसबुक पर पढ़े-लिखे दलितों का सवर्णों के प्रति आक्रोश देखता हूँ तो एक सवर्ण होने के नाते मुझे भी बुरा लगता है। लेकिन उपरोक्त करतूतों को अपनी आँखों से देखने और एक तटस्थ नागरिग के रूप में विश्लेषण करने के बाद लगता है कि उनका आक्रोश जायज ही है। पाँच छः सालों से भेदभाव का चरस मुसलमानों के लिए भी खूब बोया गया है। एक और दिलचस्प बात है कि हनुमान लला के लिए जो पताखा और लंगोटी धमदाहा बाजार से सिलकर आया था उसे सीने वाला दर्जी कोई जुबैर या इकबाल था। हमारे समाज में दक्षिण भारत की तरह एक पेरियार मूवमेंट की जरूरत है। यह लोकशाही है। अगर इज्जत और सम्मान पाना है तो लोगों को अंधेरे में रखने के बजाए उन्हें बराबर का भागीदार बनाना होगा। सवर्ण यह बात जितनी जल्दी समझ जाए उतना बढ़िया होगा।

Published by voiceofrajputs

In the Past 30 years or so, the community has witnessed decline- socially, economically and politically, one of the root causes of this multifaceted decline being - the Intellectual decline & alienation of the Community. Hence an attempt to rectify it.

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